जाने कैसे होता है अक्षय तृतीय शुभ फलदायी ?

कुवाड़ा धाम में श्री सगस भैरुनाथ की आरती

कुवाड़ा धाम में श्री सगस भैरुनाथ की आरती

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जय भैरवनाथ देवा || Jai Bhairav Baba Aarti || Hindi Aarti || Prabhulal Sen || Devotional Aarti (2021) जय सग़स देवा || Jai Sagas Baba Aarti || Hindi Aarti || Prabhulal Sen || Devotional Aarti (2021)

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श्री सगस भेरूनाथ जी महाराज का कुंवाड़ा का ड्रोन से लिया गया विहंगम दृश्य

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श्री सगस भेरूनाथ जी महाराज का कुंवाड़ा मे श्री श्री खड़ेश्वर जी महाराज की झलकिया ओर भव्य स्वागत 2019 श्री श्री 1008 खड़ेश्वर जी महाराज हार्दिक श्रद्धाजंलि भजन।khandeshwar ji maharaj shradhanjali #श्रीश्री_1008_खड़ेश्वर_जी_महाराज_श्रद्धाजंलि_भजन 😢देव लोक😢 #श्री_श्री_1008_खड़ेश्वरी_जी_महाराज_श्री का देव लोकगमन हो गया😢 गुरुदेव के चरणों मे कोटि कोटि नमन

श्री सगस भेरूनाथ जी महाराज का कुंवाड़ा का ड्रोन से लिया गया विहंगम दृश्य। kuwada bherunath dham 2019

मेवाड़ के प्रसिद्ध महंत 1008 खंडे़श्वर महाराज पंचतत्व में विलीन, 17 साल एक पैर पर खड़े रहकर की थी तपस्या दाता पायरा आश्रम के संत खड़ेश्वर महाराज शनिवार को पंचतत्व में विलीन हो गए. दाह संस्कार से पूर्व भक्तों ने पुष्प अर्पित कर उनके अंतिम दर्शन किए. शनिवार सुबह उनका आश्रम में ही अंतिम संस्कार किया गया.

श्री सगस भेरूनाथ जी महाराज का कुंवाड़ा का ड्रोन से लिया गया विहंगम दृश्य। kuwada bherunath dham drone – श्री सगस जी महाराज व भैरुनाथ का समय समय पर सभी भक्तगनों को आशीर्वाद मिलता रहे इसके लिए एक छोटा सा कदम उठाया है इसके लिए हमारे प्राचीन देव स्थान कुँवाड़ा की वैबसाइट व सभी social मीडिया अकाउंट की जानकारी इस मैसेज मे दी जा रही है जिससे सभी भक्तगनों को श्री सगस जी महाराज व भैरुनाथ के दर्शन का लाभ मिलता रहे ओर सभी के कष्टो का निवारण हो सके । ॥ ॐ श्री सगस देवाए नमः ॥ ॥ ॐ श्री भेरुनथाय नमः ॥

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Shri Sagas Bherunathji Maharaj’s glimpse and grand welcome 2019 from Shri Sri Khadeshwar Ji Maharaj in Kunwara Sri Sri 1008 Khadeshwar Ji Maharaj Heartfelt Shraddhanjali Bhajan Dev Lok # Shri_Sree_1008_Khadeshwari_G_Maharaj_Dree of God has become public. A lot of respect at the feet of Gurudev – 1008 Khandeshwar Maharaj, the famous Mahant of Mewar, merged in Panchatatva, did penance by standing on one leg for 17 years. Saint Khadeshwar Maharaj of the Donor Pyra Ashram merged with the five elements on Saturday. Before the cremation ceremony, the devotees offered flowers and had their last darshan. He was cremated at the ashram on Saturday morning. A spectacular view of Shri Sagas Bherunathji Maharaj from Kunwara’s drone. kuwada bherunath dham drone – A small step has been taken by Shri Sagas Ji Maharaj and Bhairunath to keep blessing all the devotees from time to time, for this information of our ancient Dev Place Kunwara’s website and all social media accounts are being given in this message Devotees continue to get the benefit of the philosophy of Shri Sagas Ji Maharaj and Bhaironath and all the sufferings can be eradicated. 4 Om Shri Sagas Devaay Namah 4 Om Shree Bherunthai Namah

जाने क्यो कहते है अक्षय तृतीया को शुभ मुहूर्त का दूसरा नाम

Akshaya Tritiya 2021 : अक्षय तृतीया 14 मई शुक्रवार

अक्षय तृतीया पर चंद्रमा का शुक्र के साथ शुक्रवार को वृष राशि में गोचर करना, धन, समृद्धि और निवेश के लिए बहुत ही शुभफलदायी है। (source wikipedia)
अक्षय तृतीया 2021
अक्षय तृतीया 2021- फोटो : सोशल मीडिया

अक्षय तृतीय : सम्पूर्ण जानकारी

अक्षय तृतीया या आखा तीजवैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है।[1] इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।[2] वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीयतृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।

महत्व

अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीददारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं।[3] नवीन वस्त्र, आभूषण आदि धारण करने और नई संस्था, समाज आदि की स्थापना या उदघाटन का कार्य श्रेष्ठ माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि इस दिन पितरों को किया गया तर्पण तथा पिन्डदान अथवा किसी और प्रकार का दान, अक्षय फल प्रदान करता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है। यह तिथि यदि सोमवार तथा रोहिणी नक्षत्र के दिन आए तो इस दिन किए गए दान, जप-तप का फल बहुत अधिक बढ़ जाता हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह तृतीया मध्याह्न से पहले शुरू होकर प्रदोष काल तक रहे तो बहुत ही श्रेष्ठ मानी जाती है। यह भी माना जाता है कि आज के दिन मनुष्य अपने या स्वजनों द्वारा किए गए जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिए अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान माँगने की परंपरा भी है।

अक्षय तृतीया
अक्षय तृतीया

हिन्दू धर्म में महत्व

अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर समुद्र या गंगा स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की शांत चित्त होकर विधि विधान से पूजा करने का प्रावधान है। नैवेद्य में जौ या गेहूँ का सत्तू, ककड़ी और चने की दाल अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात फल, फूल, बरतन, तथा वस्त्र आदि दान करके ब्राह्मणों को दक्षिणा दी जाती है।[4] ब्राह्मण को भोजन करवाना कल्याणकारी समझा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सत्तू अवश्य खाना चाहिए तथा नए वस्त्र और आभूषण पहनने चाहिए। गौ, भूमि, स्वर्ण पात्र इत्यादि का दान भी इस दिन किया जाता है। यह तिथि वसंत ऋतु के अंत और ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ का दिन भी है इसलिए अक्षय तृतीया के दिन जल से भरे घडे, कुल्हड, सकोरे, पंखे, खडाऊँ, छाता, चावल, नमक, घी, खरबूजा, ककड़ी, चीनी, साग, इमली, सत्तू आदि गरमी में लाभकारी वस्तुओं का दान पुण्यकारी माना गया है।[2][5][3] इस दान के पीछे यह लोक विश्वास है कि इस दिन जिन-जिन वस्तुओं का दान किया जाएगा, वे समस्त वस्तुएँ स्वर्ग या अगले जन्म में प्राप्त होगी। इस दिन लक्ष्मी नारायण की पूजा सफेद कमल अथवा सफेद गुलाब या पीले गुलाब से करना चाहिये।

सर्वत्र शुक्ल पुष्पाणि प्रशस्तानि सदार्चने।

“दानकाले च सर्वत्र मंत्र मेत मुदीरयेत्॥”

अर्थात सभी महीनों की तृतीया में सफेद पुष्प से किया गया पूजन प्रशंसनीय माना गया है।

ऐसी भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया पर अपने अच्छे आचरण और सद्गुणों से दूसरों का आशीर्वाद लेना अक्षय रहता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन किया गया आचरण और सत्कर्म अक्षय रहता है।[6]

भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है, सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है।[6] भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था।[5] ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था।[2] इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं। प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं। वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं।[5][3] जी.एम. हिंगे के अनुसार तृतीया ४१ घटी २१ पल होती है तथा धर्म सिंधु एवं निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार अक्षय तृतीया ६ घटी से अधिक होना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसा इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए।[1] इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था।[2] ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता। मदनरत्न के अनुसार:

अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥

उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥

प्रचलित कथाएँ

अक्षय तृतीया की अनेक व्रत कथाएँ प्रचलित हैं। ऐसी ही एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक धर्मदास नामक वैश्य था। उसकी सदाचार, देव और ब्राह्मणों के प्रति काफी श्रद्धा थी। इस व्रत के महात्म्य को सुनने के पश्चात उसने इस पर्व के आने पर गंगा में स्नान करके विधिपूर्वक देवी-देवताओं की पूजा की, व्रत के दिन स्वर्ण, वस्त्र तथा दिव्य वस्तुएँ ब्राह्मणों को दान में दी।[3] अनेक रोगों से ग्रस्त तथा वृद्ध होने के बावजूद भी उसने उपवास करके धर्म-कर्म और दान पुण्य किया। यही वैश्य दूसरे जन्म में कुशावती का राजा बना।[5] कहते हैं कि अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान व पूजन के कारण वह बहुत धनी प्रतापी बना। वह इतना धनी और प्रतापी राजा था कि त्रिदेव तक उसके दरबार में अक्षय तृतीया के दिन ब्राह्मण का वेष धारण करके उसके महायज्ञ में शामिल होते थे। अपनी श्रद्धा और भक्ति का उसे कभी घमंड नहीं हुआ और महान वैभवशाली होने के बावजूद भी वह धर्म मार्ग से विचलित नहीं हुआ। माना जाता है कि यही राजा आगे चलकर राजा चंद्रगुप्त के रूप में पैदा हुआ।[2][3]

स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में उल्लेख है कि वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को रेणुका के गर्भ से भगवान विष्णु ने परशुराम रूप में जन्म लिया। कोंकण और चिप्लून के परशुराम मंदिरों में इस तिथि को परशुराम जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। दक्षिण भारत में परशुराम जयंती को विशेष महत्व दिया जाता है। परशुराम जयंती होने के कारण इस तिथि में भगवान परशुराम के आविर्भाव की कथा भी सुनी जाती है। इस दिन परशुराम जी की पूजा करके उन्हें अर्घ्य देने का बड़ा माहात्म्य माना गया है। सौभाग्यवती स्त्रियाँ और क्वारी कन्याएँ इस दिन गौरी-पूजा करके मिठाई, फल और भीगे हुए चने बाँटती हैं, गौरी-पार्वती की पूजा करके धातु या मिट्टी के कलश में जल, फल, फूल, तिल, अन्न आदि लेकर दान करती हैं। मान्यता है कि इसी दिन जन्म से ब्राह्मण और कर्म से क्षत्रिय भृगुवंशी परशुराम का जन्म हुआ था। एक कथा के अनुसार परशुराम की माता और विश्वामित्र की माता के पूजन के बाद प्रसाद देते समय ऋषि ने प्रसाद बदल कर दे दिया था। जिसके प्रभाव से परशुराम ब्राह्मण होते हुए भी क्षत्रिय स्वभाव के थे और क्षत्रिय पुत्र होने के बाद भी विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाए। उल्लेख है कि सीता स्वयंवर के समय परशुराम जी अपना धनुष बाण श्री राम को समर्पित कर संन्यासी का जीवन बिताने अन्यत्र चले गए। अपने साथ एक फरसा रखते थे तभी उनका नाम परशुराम पड़ा।

संस्कृति में

इस दिन से शादी-ब्याह करने की शुरुआत हो जाती है। बड़े-बुजुर्ग अपने पुत्र-पुत्रियों के लगन का मांगलिक कार्य आरंभ कर देते हैं। अनेक स्थानों पर छोटे बच्चे भी पूरी रीति-रिवाज के साथ अपने गुड्‌डा-गुड़िया का विवाह रचाते हैं। इस प्रकार गाँवों में बच्चे सामाजिक कार्य व्यवहारों को स्वयं सीखते व आत्मसात करते हैं। कई जगह तो परिवार के साथ-साथ पूरा का पूरा गाँव भी बच्चों के द्वारा रचे गए वैवाहिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि अक्षय तृतीया सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का अनूठा त्यौहार है। कृषक समुदाय में इस दिन एकत्रित होकर आने वाले वर्ष के आगमन, कृषि पैदावार आदि के शगुन देखते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस दिन जो सगुन कृषकों को मिलते हैं, वे शत-प्रतिशत सत्य होते हैं। राजपूत समुदाय में आने वाला वर्ष सुखमय हो, इसलिए इस दिन शिकार पर जाने की परंपरा है।

शुभ मुहूर्त का दूसरा नाम है अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया 14 मई शुक्रवार को मनाई जाएगी। हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर साल यह त्योहार वैशाख माह शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि पर अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस तिथि पर किया गया कोई भी शुभ कार्य सफल होता है। इस कारण लोग अक्षय तृतीया के दिन विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यापार, धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ करते हैं। सोना खरीदने के लिए भी यह तिथि बेहद शुभ होती है।

अक्षय तृतीया पर चंद्रमा का शुक्र के साथ शुक्रवार को वृष राशि में गोचर करना, धन, समृद्धि और निवेश के लिए बहुत ही शुभफलदायी है। अक्षय तृतीया पर चंद्रमा संध्या काल में मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। मिथुन राशि में इस समय मंगल का संचार हो रहा है। ऐसे में चंद्रमा के मिथुन राशि में आने से यहां धन योग का निर्माण होगा।

अक्षय तृतीया 2021
अक्षय तृतीया 2021- फोटो : सोशल मीडिया

धन प्राप्ति के लिए करें उपाय

  1. अक्षय तृतीया के दिन 11 कौड़ियां लेकर उन्हें किसी लाल कपड़े में बांध लें और इन्हें पूजा के स्थान पर रख दें। अगले दिन फिर स्नान के पश्चात् इन कौड़ियों को अपनी तिजोरी में रख लें। यह करने से आपकी आर्थिक परेशानियां दूर हो जाएंगी। आपके ऊपर मां लक्ष्मी की कृपा बरसने लगेगी।
  2. धन की देवी लक्ष्मी माता के लिए नारियल सबसे प्रिय माना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन मां लक्ष्मी के समक्ष एक नारियल लाकर स्थापित करें। इस टोटके को आजमाने से आपके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होगी। 
  3. यदि आपकी संतान का विवाह नहीं हो रहा है। उसके विवाह में देरी हो रही है। योग्य वर अथवा वधु नहीं मिल रहा है तो आप अक्षय तृतीया के दिन अपने आस-पास होने वाली शादी में कन्या दान अवश्य करें। यह उपाय करने से जल्द ही आपकी संतान की शादी के योग बनेंगे।    
  4. अक्षय तृतीया के दिन किए गए दान का अक्षय फल प्राप्त होता है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए अक्षय तृतीया के दिन दान अवश्य ही करना चाहिए। अक्षय तृतीया के दिन आप जरूरतमंद लोगों को पंखा, चप्पल, छाता, ककड़ी और खरबूजा आदि चीजें दान कर सकते हैं। यह उपाय आपकी आर्थिक स्थिति को भी मजबूत करेगा। 

कुंवाड़ा भैरूनाथ व सगस जी महाराज के आज रविवार मई 9, 2021 के दर्शन

।। ओम् श्री भेरवाए नमः ।। ।। ओम् श्री सग़स देवाए नमः ।।
प्रातः कालीन श्री सग़स भेरुनाथ के दर्शन 09/05/2021
वैशाख कृष्णा तेरस . विक्रम संवत् 2078
वरुथिनी तेरस . रविवार मई 9, 2021
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आज के दर्शन

प्राचीन देव स्थान पर लाइव भैरुनाथ बाबा के दर्शन

श्री सगस जी महाराज व भैरुनाथ के दर्शन

श्री सगस जी महाराज व भैरुनाथ के दर्शन


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कुवाड़ा भैरुनाथ मे आप सभी भक्तो का सादर आमंत्रण है

श्री सगस व भेरुनाथ भक्तो के लिए अच्छी खबर है कि कूवाड़ा भेरुनाथ मंदिर परिसर मे हर रविवार श्रद्धालुओं को दर्शन करवाने के लिए kuwadabherunath.com वैबसाइट का निर्माण किया गया है | श्री सगस जी महाराज व भेरुनाथ के दर्शन के लिए आप मोबाइल से भी दर्शन का लाभ ले सकते है ।
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